हिन्दू मंदिर रहस्यों से भरे होने के लिए भी जाने जाते है, जिनमे से कुछ रहस्य डरावने होते है तो कुछ बहुत रोचक, लेकिन आज हम जिस रहस्य के बारे में बात करने जा रहे है वो भयानक नहीं लेकिन रोचक होने के साथ मन को शांति देने वाला है।
जी हां! आज हम बात कर रहे है बांके बिहारी मंदिर की जो वृन्दावन में है। इनके बारे में तो आप सबने सुना होगा लेकिन इनके चमत्कार इतने रोचक है की इन्हे जितनी बार सुना जाये उतना कम है।
ये एक ऐसे भगवान है जो सिर्फ हिन्दुओं के लिए ही नहीं बल्कि विदेशियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र रहे है।
भगवान कृष्ण के कई नाम है जैसे, श्याम, वासुदेव, बांके बिहारी और इसके अलावा भी बहुत नाम है लेकिन हमारा आज का विषय बांके बिहारी है।
तो आइये जानते है उनके बारे में।

बांके बिहारी मंदिर उत्तर प्रदेश के मथुरा में पावन वृन्दावन में स्थित है। वृन्दावन अपने आप में ही एक पवित्र जगह है जहां भगवान कृष्ण का समय बीता है। इस जगह पर आते ही आपको एक अलग भावना महसूस होगी। यहाँ की हवा में एक अलग ही शांति और पवित्रता है। लेकिन यहाँ एक सबसे रोचक बात यह है की यदि आप बिहारी जी के मंदिर जाना चाहते है तो आपको हर गली बिहारी जी के मंदिर लेकर जाएगी। आप वहाँ खो नहीं सकते है।

Banke Bihari templeSource: traveltomysteries

 

बांके बिहारी का रूप भगवान कृष्ण के सभी रूपों में से सबसे अलग है क्योंकि ये कृष्ण और उनकी शक्ति राधा रानी का मिला हुआ रूप है।

लेकिन इस रूप की कहानी क्या है?

कहा जाता है बांके बिहारी की सबसे पहले पूजा स्वामी हरिदास जी द्वारा निधिवन में की गयी थी जो की मशहूर गायक तानसेन के गुरु थे।
इन कुञ्ज-बिहारी के बांके बिहारी में परिवर्तन होने की कहानी जितनी रोचक है उससे कही ज्यादा मन को शांति देने वाली और ख़ूबसूरत है।
स्वामी हरिदास जी भगवान कृष्ण और राधा के बहुत बड़े भक्त थे। उन्होंने अपने गांव को राधा-कृष्ण की पूजा करने और ध्यान करने के लिए छोड़ दिए और वृन्दावन में आ गए। उन्होंने निधिवन में राधा-कृष्ण की पूजा के लिए एक जगह चुनी जिसे कुञ्ज कहा जाता था।
स्वामी हरिदास जी का ध्यान के जीवंत आनंद को महसूस करने का तरीका था अपने आराध्य के लिए भजन बनाना और उन्हें गाना। उनका अधिकतर समय इसी तरह से बीतता था। इस तरह उन्हें हमेशा अपने भगवान से समीपता महसूस होती थी।
एक दिन उनके शिष्यों को यह जानने की उत्सुकता हुई की आखिर उनके गुरु कुञ्ज में क्या करते है, किसकी पूजा करते है। वह भी उनके भगवान को देखना चाहते थे।
उनकी इच्छा को पूरा करने के लिए स्वामी हरिदास जी उन्हें कुञ्ज में लेकर गए। उस दिन वहाँ का वातावरण प्रतिदिन से बहुत अलग था। हवा में एक अलग ठंडक थी। सुगन्धित हवा बह रही थी जो किसी के भी मन को मोह ले।
कुञ्ज में पहुंच कर स्वामी जी ने यह छंद गाया,”माई री सहज जोरि प्रगत भई जू रंग की गोर स्याम घन दामिनी जैसे। प्रथम हुं आहुति अब हुं आगे हुं रहीहइ न तरिहई तैसें, अंग अंग की उजराई सुघराई चतुराई सुंदरता ऐसे श्री हरिदास के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी सम वस् वैसें” इस पंक्ति को गाने के बाद एक प्रकाश पुंज उनके सामने प्रकट हुआ जिसका तेज़ साधारण लोगो से सेहन नहीं किया जा सकता था। उस प्रकाश में तभी दिव्य और सुन्दर श्याम श्यामा प्रकट हुए। उनकी छवि ऐसी थी की नज़र ना हटे।

Source: traveltomysteries

उनके चेहरे पर एक अलग ही छटा थी, उनकी मुस्कान चंचलता से भरी थी। वह खड़े सभी लोग उनकी इस दिव्य छवि से मंत्रमुग्ध हो गए। उन्हें किसी की सुध ना रही मानो एक बुत के जैसे हो गए।
यह दशा देखने पर स्वामी जी ने राधा कृष्ण से प्रार्थना करी की वह दोनों एक रूप ले, क्योंकि दुनिया उनके स्वरुप की सुंदरता को सँभालने में सक्षम नहीं है।
उनकी इस प्रार्थना पर राधा कृष्ण दोनों एक रूप हो गए और एक अलौकिक काली प्रतिमा के
रूप में बदल गए।

उस प्रतिमा को पहले निधिवन में रखा गया बाद में उसे बांके बिहारी मंदिर में स्थापित कर दिया गया। जिस प्रतिमा को आज हम सब बांके बिहारी मंदिर में देखते है, वह वही प्रतिमा है जो राधा-कृष्ण ने स्वामी हरिदास जी को दी थी।

बांके बिहारी नाम क्यों पड़ा?

बांके का अर्थ है- तीन स्थानों पर झुका हुआ और बिहारी/विहारी का अर्थ है सर्वोच्च आनंद लेने वाला। इसके अलावा बांके बिहारी नाम के पीछे का कारण है की उनकी यह प्रतिमा त्रिभंग अवस्था में खड़ी है, जिसके कारण उन्हें बांके बिहारी कहा जाता है।

बांके बिहारी मंदिर के तथ्य

बांके बिहारी मंदिर में हर 2 मिनट में पर्दा डाल दिया जाता है। ऐसा करने के पीछे का कारण काफी हैरान करने वाला है लेकिन सत्य है। बांके बिहारी की सुंदरता इतनी मनमोहिनी है की उनकी आँखों से देर तक संपर्क हो जाने से इंसान अपनी सुदबुध खो बैठता है। क्योंकि इनका ये स्वरुप प्रेम का प्रतीक भी है इसलिए ये उस व्यक्ति पर ऐसा प्रेम डालते है की उसे अपना भी होश नहीं रहता।
इस बात को लेकर पिछले समय में काफी बाते घट चुकी है इसलिए उनके सामने पर्दा डाला जाता है जिससे कोई भी उनसे लगातार आँखों से सम्पर्क ना बना सके। अगर आपको उनकी लीलाओं के बारे में और जानना है तो आप मंदिर के बाहर दुकानों से “बांके बिहारी के चमत्कार” किताब ले सकते है।

बांके बिहारी मंदिर में श्रद्धा के बिना नहीं जाया जा सकता और एक बार जाने के बाद आपका बार-बार आने का मन करेगा। उन्हें प्यार से देखोगे तो बदले में वो भी आपको उतने ही प्यार से देखेंगे, ये मैं अपने अनुभव से कह रही हूँ।
आप वृन्दावन कभी भी जा सकते है लेकिन वहाँ जाने का सबसे अच्छा समय किसी बड़े त्यौहार के दौरान जाने का है जैसे- होली, अक्षय तृतीया, हरियाली तीज और जन्माष्टमी आदि। वह इन सभी त्योहारों पर कुछ ना कुछ अलग होता है जैसे वहाँ होली में लठमार होली शामिल होती है, अक्षय तृतीया पर उनके चरणों के दर्शन होते है और हरियाली तीज पर उन्हें झूले में झुलाया जाता है।
बांके बिहारी मंदिर का समय गर्मियों में सुबह 7:45AM – 12:00PM है और शाम में 5:30PM – 9:30PM है। सर्दियों में सुबह 8:45AM to 1:00PM और शाम में 4:30PM – 8:30PM है।
सूचना: अगर आप किसी त्यौहार के दौरान वृन्दावन जा रहे है तो कम से कम 2 दिन पहले पहुंचे क्योंकि त्यौहार से एक दिन पहले वहाँ भीड़ की वजह से रस्ते बंद हो जाता है और पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
वृन्दावन में केवल बांके बिहारी मंदिर ही नहीं लेकिन हज़ारो मंदिर और है इसलिए वहाँ अगर आप जा रहे है तो समय निकाल कर जाये।

Banke Bihari at holiSource: traveltomysteries

 

यदि आप घर बैठे ही उन बांके बिहारी के दर्शन करना चाहते है तो इस तरह उनका ध्यान कर सकते है- “मैं गोविन्द (कृष्ण) की पूजा करती/करता हूँ, जिनके गले में सजे हुए सुगन्धित फूलों की माला चन्द्रमा के कुंडे के साथ सजी हुई है, जिनके दोनों हाथ में सुंदर बांसुरी और हीरे जड़ित गहने है, जो हमेशा प्रेम की मूरत के रूप में प्रकट होते है, जिनका त्रिभंग रूप मन को मोहने वाला है और जिनके चेहरे पर एक चंचल मुस्कान बनी हुई है।”

वृन्दावन में हर व्यक्ति का अपना अलग अनुभव होता है। तो आप में से कौन वृन्दावन जाने का सोच रहा है? नीचे कमेंट में बताये और अपने अनुभव यह ज़रूर बांटे।

राधे राधे!